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हिन्दी कविता


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गुरू नानक

एक शक्‍ती के हैं

भगवान नीचे आ

बात है अक्‍ल की

उस पार चल के देखें

जर्रा जर्रा कतरा होता

तकदीर का खेल

मन क्‍या मेरा मन है

हम उधर नहीं जाते

ज़िन्‍दगी दो दिनों का

मौत इक उजाला

सबका जीवन इसी तरह

सुख और दुख

हमने कितने महल

ज़रूरत है

घर की बच्‍ची हुई

नफ़रत के पौधे

कैसी जग की रीत

सारी मर्ज़ी बस है

और की भूख

मेरा घर है मन्‍दिर

समझदार व्‍यापारी

दो दिलों का मिलाप

साथ तुम थे साथ हम

ज़िन्‍दगी मौत से क्‍या

आसमान से ज़मीन

एक क़तरा

प्‍यार की डोर

पुजारी

देवदासी

सपने

वेश्‍या

नाजायज़ बच्‍चा

नेता जी

रिश्‍वत

जब तक थे हम एक

ज़ोर ज़ोर से दिल

देश आखिर ये कैसा देश

हद तक

चलते रहो बढ़ते रहा

ऐसी बातें तुम मत

दुनिया में गरीबों का

जवानी चार दिन की

सपनों का शहर

प्‍यार बांटो नफरत नहीं

रिश्‍ते न तोड़ो

इश्‍क तो हम सबने

तुम ग़म से मुंह मत

न बात करो बटवारे

हर तरफ खून ही खून

 

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